पत्रकारिता का काला अध्याय: जब चौथा स्तंभ ही कटघरे में हो
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| संपादकीय- प्रिंसु पाण्डेय स्वरांजली न्यूज साप्ताहिक न्यूजपेपर |
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब यही स्तंभ दरकने लगे तो पूरी व्यवस्था हिल जाती है। आज का समय भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का एक ऐसा दौर बनता जा रहा है, जिसे भविष्य की पीढ़ियां शायद “काला अध्याय” कहकर याद करेंगी। कारण साफ है—सच की जगह सौदेबाज़ी, मिशन की जगह कमीशन, और जनसेवा की जगह निजी स्वार्थ ने जगह बनानी शुरू कर दी है।
पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल करना था, लेकिन अब सवाल उठ रहे हैं खुद पत्रकारिता की नीयत पर। प्रेस कार्ड, जो कभी जिम्मेदारी और साहस का प्रतीक था, अब कुछ हाथों में डर और दबाव का हथियार बनता जा रहा है। फर्जी पहचान, उगाही, दलाली और प्रभाव का कारोबार खुलेआम चल रहा है। इससे न केवल पेशे की गरिमा गिर रही है, बल्कि समाज का भरोसा भी टूट रहा है।
सबसे दुखद यह है कि असली पत्रकार—जो आज भी जोखिम उठाकर सच सामने ला रहे हैं—उन्हें भी उसी शक की नजर से देखा जाने लगा है। जनता के मन में यह भ्रम पैदा होना कि कौन पत्रकार है और कौन व्यापारी, पत्रकारिता की सबसे बड़ी हार है। भरोसे का संकट किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत होता है।
मीडिया संस्थानों की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है। टीआरपी की अंधी दौड़, सनसनी की भूख और कॉरपोरेट दबाव ने खबर को उत्पाद में बदल दिया है। जब खबर बिकने लगे, तो नैतिकता सबसे पहले मरती है। पत्रकारिता का पतन अचानक नहीं होता—यह धीरे-धीरे मूल्यों के क्षरण से होता है।
अब वक्त आ गया है आत्ममंथन का। पत्रकारिता को खुद अपने भीतर झांकना होगा। सख्त आचार संहिता, जवाबदेही, पारदर्शिता और पेशेवर प्रशिक्षण अनिवार्य करने होंगे। साथ ही समाज को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि जागरूक नागरिक ही स्वतंत्र पत्रकारिता की असली ताकत होते हैं।
हर काला अध्याय स्थायी नहीं होता। इतिहास बताता है कि गिरावट के बाद पुनर्जागरण भी आता है। सवाल यह है—क्या पत्रकारिता फिर से अपने मूल धर्म, अपने साहस और अपने चरित्र को वापस हासिल कर पाएगी? अगर हां, तो यही संकट एक नई शुरुआत भी बन सकता है।
