अंबिकापुर में जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बसन्त पण्डो को “पुत्र” कहकर सम्मानित किया। 1952 की ऐतिहासिक विरासत फिर जीवंत।
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा—“बसन्त आप मेरे भी पुत्र हैं” | 73 साल पुरानी विरासत जीवंत
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, बसन्त पण्डो, अंबिकापुर न्यूज़, जनजातीय गौरव दिवस, पण्डो जनजाति, राजेंद्र प्रसाद 1952, ट्राइबल न्यूज छत्तीसगढ़, Pando Tribe, Tribal Rights Chhattisgarh
राष्ट्रपति मुर्मु बोलीं—“बसन्त, आप मेरे भी पुत्र हैं
अंबिकापुर में 73 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत फिर जीवंत
अंबिकापुर | Special Report — Swaranjali News
जनजातीय गौरव दिवस के राज्य स्तरीय कार्यक्रम में गुरुवार को एक ऐसा क्षण देखने को मिला जिसने न सिर्फ अंबिकापुर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज को गौरव से भर दिया।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने पण्डो जनजाति के वरिष्ठ सदस्य बसन्त पण्डो को मंच पर बुलाकर आत्मीय सम्मान प्रदान किया और कहा—
“आप मेरे भी पुत्र हैं।”
यह वाक्य सुनते ही पूरा सभामंडप तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह दृश्य अंबिकापुर के इतिहास में दर्ज होने योग्य साबित हुआ।
1952 की ऐतिहासिक स्मृति—डॉ. राजेंद्र प्रसाद से बना दत्तक संबंध
बसन्त पण्डो का राष्ट्रपति से यह भावनात्मक जुड़ाव आज का नहीं है।
साल 1952 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अंबिकापुर आए थे। वहां मौजूद 8 वर्षीय बालक गोलू (आज के बसन्त पण्डो) ने अपनी मासूमियत से राष्ट्रपति को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उसे गोद में उठा लिया।
इसी दौरान राष्ट्रपति प्रसाद ने उसका नाम बदलकर “बसन्त” रखा और उसे अपना प्रतीकात्मक दत्तक पुत्र मान लिया।
इसी विरासत के कारण पण्डो जनजाति को “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” कहकर सम्मानित किया जाता है।
पण्डो समाज में उत्साह—राष्ट्रपति का संदेश बना नई ऊर्जा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा बसन्त पण्डो को “पुत्र” कहने से पण्डो समाज में नई ऊर्जा और गर्व की लहर दौड़ गई।
समुदाय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कहा—
-
यह पूरा समाज के सम्मान का क्षण है।
-
राष्ट्रपति का यह संदेश राष्ट्रीय स्तर पर पण्डो जनजाति की पहचान को और मजबूती देगा।
-
इससे पण्डो समाज के मुद्दे केंद्र और राज्य सरकार तक और प्रभावी ढंग से पहुँचेंगे।
बसन्त पण्डो—80 वर्ष की आयु में भी वही सरलता
लगभग 80 वर्षीय बसन्त पण्डो आज भी सादगी और विनम्रता के साथ जीवन जीते हैं।
उन्होंने मुलाकात को अपने “जीवन का सर्वोच्च सम्मान” बताया और कहा कि राष्ट्रपति मुर्मु ने वही अपनापन दिया जो 1952 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने दिया था।
बसन्त पण्डो ने राष्ट्रपति को सौंपे 5 प्रमुख मांग-पत्र
पण्डो समाज की बेहतरी के लिए बसन्त पण्डो ने राष्ट्रपति के समक्ष निम्न लिखित मांगें प्रस्तुत कीं—
1. पण्डो जनजाति को केंद्र की ST सूची में शामिल किया जाए।
ताकि वे केंद्रीय योजनाओं और राष्ट्रीय लाभों से सीधे जुड़ सकें।
2. पण्डो समाज को स्वीकृत भूमि के पट्टों का वितरण किया जाए।
3. शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता मिले।
4. पण्डो समाज निवासरत जिलों में आवासीय शिक्षा संस्थान खोले जाएँ।
5. सभी पण्डो बहुल जिलों में अस्पताल एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
कार्यक्रम स्थल बना ऐतिहासिक क्षण का साक्षी
जब राष्ट्रपति ने बसन्त पण्डो को सम्मानपूर्वक मंच पर बुलाया, पूरा सभामंडप भावुक और गर्व से भर उठा।
मंच पर मौजूद जनजातीय नेता, सामाजिक प्रतिनिधि और अधिकारी यह क्षण जीवन भर याद रखने की बात कहते दिखाई दिए।
यह दृश्य अंबिकापुर के इतिहास में एक स्वर्णाक्षरों से लिखे जाने योग्य दिन के रूप में दर्ज हो गया।
