चढ़ावे के दम पर चल रहे अवैध ईंट भट्ठे, नियम-कानून कागजों में सिमटे, खनिज विभाग ध्यान मुद्रा में व्यस्त
कोरिया।
जिले के जमगहना और खांडा क्षेत्र में अवैध ईंट भट्ठों का संचालन खुलेआम किया जा रहा है, लेकिन संबंधित विभागों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। मुख्य मार्ग के ठीक किनारे वर्षों से चल रहे इन भट्ठों के पास न तो पर्यावरणीय स्वीकृति है और न ही ग्राम पंचायत से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी), इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर ईंट पकाने का काम निर्बाध जारी है।
सूत्रों के अनुसार, खांडा क्षेत्र में स्थित जलाशय से अवैध रूप से पानी का उपयोग ईंट निर्माण में किया जा रहा है, जबकि यह जलाशय सिंचाई और पेयजल जैसे सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है। इतना ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण के तहत अनिवार्य वृक्षारोपण भी इन भट्ठों के आसपास नहीं किया गया है। लगातार निकलने वाले धुएं और राख से आसपास के गांवों में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
नियमों की बात करें तो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1981 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम 1974 के तहत बिना अनुमति किसी भी ईंट भट्ठे का संचालन अवैध है। वहीं छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम के अनुसार ग्राम पंचायत की एनओसी और निर्धारित शुल्क का भुगतान अनिवार्य है। उल्लंघन की स्थिति में भट्ठा सील करने और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
सूत्रों का आरोप है कि इन अवैध ईंट भट्ठा संचालकों द्वारा प्रतिवर्ष संबंधित विभागों को “चढ़ावा” दिया जाता है, जिसके चलते खनिज विभाग और राजस्व विभाग कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि भट्ठों में अवैध कोयले का उपयोग कर ईंटें पकाई जा रही हैं, जो सीधे तौर पर खनिज नियमों का उल्लंघन है।
हैरानी की बात यह है कि जिले के अन्य क्षेत्रों में छोटी-मोटी अनियमितताओं पर भी तत्काल कार्रवाई की जाती है, लेकिन जमगहना-खांडा क्षेत्र में वर्षों से चल रहे अवैध भट्ठों पर प्रशासन की नजर नहीं पड़ रही।
ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से मांग की है कि तत्काल जांच कर अवैध ईंट भट्ठों को सील किया जाए, दोषियों के खिलाफ पर्यावरण कानून, खनिज नियम और पंचायत अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की जाए तथा जलाशय और पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई कराई जाए। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो क्षेत्र गंभीर पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ सकता है।
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